संतु लन
A poem that relates to all phases of success &
simplify the mystical middle way in poetic rhymes.
एक रस्सी है जिस पर चलना है।
नीचे दरिया है और संभलना है।
हवा के झोकें भी आएंगे,
कानो में कुछ कह जायेगे।
दरिया से मौत पुकारेगी,
रह-रह कर तुझे डराएगी।
पर एक आस भी होगी तेरे संग,
मंजिल को जब तू देखेगा।
कुछ लोग वहां खड़े होगें
और तू उनसे यह पूछेगा।
बतलाओ मुझे इस दरिया को
तुमने कैसे यूँ पार किया?
कैसे तुमने रस्सी पर चल
इस मंजर को दुस्वार किया?
कैसे तुमने मंजिल पा ली?
कैसे तुमने आगाज किया ?
कई आवाजें तुझ तक आएँगी
पर तु कुछ सुन ना पायेगा।
हर आवाज अलग होगी
कैसे तेरे समझ में आएगा।
जब हो हताश तू जाँ भरकर
रस्सी पर कदम बढ़ायेगा।
रस्सी तुझसे खुद बोलेगी
जब वो हलकी सी डोलेगी।
तू जितना भी घबराएगा
रस्सी उतनी हिलती जाएगी,
जिस तरफ भी रस्सी जाएगी
तेरे मन को भी ले जाएगी,
तब जाकर ये बात समझ
तेरे मन को आएगी
कि,
मन से बंधी रस्सी की डोर।
मन में ही रमा मंजिल का छोर।
मन चाहे जहाँ राह वहां
हो चाहे खड़े पहाड़ वहां।
मन को समझ रस्सी पर तू
जैसे ही कदम बढ़ाएगा,
संतुलित तेरा शरीर!
रस्सी पर चल जायेगा।
और मंजिल को पा जायेगा।





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