मन के मटमैले पानी में अब काई जमने लगी है।
मन के मटमैले पानी में
अब काई जमने लगी है।
जज्बातों की फिसलन से
मेरा वजूद कई बार फिसल चुका है।
भावों की सडन से
मेरा दम कई बार घुट चुका है।
हृदय का स्पंदन कई बार रुक चुका है।
पानी में बैठे कई सालों के सपनों के जमाव से
मन का भार ढो रहा शरीर अब फैसला कर चुका है।
निस्तेज सा पड़ा मैं ,एक अँधेरे से कमरे की
सीलन से भरी छत के एक कोने से
आती दूधिया रौशनी में
एक समुद्र में खोये तैराक की तरह
छप -छप करता, कहीं न दिखते किनारे की आस में बैचैन
डरता हूँ कहीं डूब गया तो कहाँ जाऊँगा ?
अब काई जमने लगी है।
जज्बातों की फिसलन से
मेरा वजूद कई बार फिसल चुका है।
भावों की सडन से
मेरा दम कई बार घुट चुका है।
हृदय का स्पंदन कई बार रुक चुका है।
पानी में बैठे कई सालों के सपनों के जमाव से
मन का भार ढो रहा शरीर अब फैसला कर चुका है।
निस्तेज सा पड़ा मैं ,एक अँधेरे से कमरे की
सीलन से भरी छत के एक कोने से
आती दूधिया रौशनी में
एक समुद्र में खोये तैराक की तरह
छप -छप करता, कहीं न दिखते किनारे की आस में बैचैन
डरता हूँ कहीं डूब गया तो कहाँ जाऊँगा ?


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