ओ ! योगी कैलाशी मेरे ध्यान में उतरो मुझमे समाओ।
ओ !योगी कैलाशी अन्तः पुर वासी
पाताल मानसरोवर का मीठा जल पान कराओ
सोम संजीवनी भंगा को हथेली पर मसल खिलाओ
मेरे ध्यान में उतरो !
मेरे भावों में बहो !
ओ !योगी कैलाशी !
उद्गम से निकली पवनों का पहला स्पर्श कराओ।
हे !हो मस्त मौज की धारों पर डमरू टंकार सुनाओ।
तुम नर्त्य करो
तुम स्वांग भरो।
नटराज रूप विकराल धरो।
तुम करो ध्रुव अंगूठे को, पृथ्वी को तेज़ घुमाओ।
ओ ! योगी कैलाशी !
तुम हंसो जगत का रुख मोड़ो
दो दिशा उठो पदचाप छोडो
खोल आँख सम्मोहन की
हम भटकों से नजर मिलाओ।
ओ ! योगी कैलाशी अन्तः पुर वासी।



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